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मेनका गांधी जैन समाज से सार्वजनिक रूप से माफी मांगें, अन्यथा होगा राष्ट्रव्यापी आंदोलन – अभिषेक जैन बिट्टू

जयपुर

मेनका गांधी

। अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा नेत्री मेनका गांधी द्वारा जैन साधु-संतों की पिच्छिका (पिछी) को लेकर दिए गए कथित बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे जैन धर्म, उसकी वैज्ञानिक परंपराओं और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात बताया है। *संघ ने मांग की है कि मेनका गांधी तत्काल जैन समाज से सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगें, अन्यथा देशव्यापी लोकतांत्रिक आंदोलन चलाया जाएगा।

संघ राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि* मेनका गांधी का बयान उनके अधूरे ज्ञान और तथ्यों की जानकारी के अभाव को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत में जैन मुनि, साधु एवं साध्वियों की कुल संख्या लगभग 15 से 18 हजार के बीच है, जबकि दिगंबर परंपरा में आचार्य, मुनि, एलक, क्षुल्लक एवं आर्यिकाओं की संख्या लगभग 400 से 600 के बीच रहती है। लगातार विहार, कठोर तप और संयमपूर्ण जीवन के कारण उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से सीमित रहती है।

अभिषेक जैन बिट्टू ने स्पष्ट किया कि श्वेतांबर परंपरा के साधु-साध्वियां मोर पंखों का उपयोग नहीं करते हैं। केवल दिगंबर मुनि पिच्छिका धारण करते हैं, जिसका उद्देश्य जीवों की रक्षा करना और अहिंसा के सिद्धांत का पालन करना है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तथ्य यह है कि मोर प्रत्येक वर्ष प्रजनन काल के पश्चात अगस्त-सितंबर के दौरान अपने लंबे पंख प्राकृतिक रूप से स्वयं गिरा देता है। इस प्रक्रिया को "मोल्टिंग" कहा जाता है। इन गिरे हुए पंखों को एकत्रित कर पिच्छिका बनाई जाती है। किसी भी मोर को मारकर या उसे नुकसान पहुंचाकर पंख प्राप्त नहीं किए जाते। इसके विपरीत जैन परंपरा में किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाना धर्म विरुद्ध माना जाता है।

उन्होंने कहा कि दिगंबर मुनि सामान्यतः चातुर्मास के पश्चात दीपावली के आसपास अपनी पिच्छिका का परिवर्तन करते हैं। इसका कारण यह होता है कि लंबे समय तक उपयोग के कारण पिच्छिका के डंठल कठोर हो जाते हैं, जिससे जीवों की रक्षा हेतु की जाने वाली मार्जन प्रक्रिया प्रभावी रूप से नहीं हो पाती। यह परिवर्तन भी उन्हीं प्राकृतिक रूप से प्राप्त पंखों से किया जाता है जो मोरों द्वारा स्वयं त्यागे गए होते हैं।

अभिषेक जैन बिट्टू ने प्रश्न उठाया कि* जब मोर हर वर्ष स्वाभाविक रूप से अपने पंख छोड़ते हैं और देश में उनकी संख्या लाखों में है तथा पिछले वर्षों में लगातार बढ़ी है, तब यह आरोप कैसे लगाया जा सकता है कि जैन मुनियों की पिच्छिका के कारण हजारों मोरों की मृत्यु होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे निराधार आरोप समाज में भ्रम फैलाने वाले हैं और तथ्यों से परे हैं।

उन्होंने कहा कि जैन धर्म विश्व का सबसे प्राचीन अहिंसा प्रधान धर्म है, जहां सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का विचार किया गया है। जैन धर्म की प्रत्येक परंपरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, करुणा और जीवदया पर आधारित है। किसी भी विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले उसके धार्मिक और वैज्ञानिक पक्ष को समझना आवश्यक है।

संघ ने मांग की कि मेनका गांधी अपने बयान पर पुनर्विचार करें, जैन समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए सार्वजनिक क्षमा याचना करें तथा भविष्य में किसी भी धर्म और उसकी परंपराओं के संबंध में तथ्यहीन टिप्पणी करने से बचें।

प्रमुख मांगें

 मेनका गांधी जैन समाज से सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगें।

* जैन साधु-संतों एवं पिच्छिका को लेकर दिए गए कथित बयान को वापस लिया जाए।

* धार्मिक विषयों पर बिना तथ्य एवं प्रमाण के टिप्पणी करने से बचा जाए।

* जैन धर्म एवं उसकी अहिंसक परंपराओं के संबंध में फैलाई जा रही भ्रांतियों को दूर किया जाए।

* माफी नहीं मांगने की स्थिति में राष्ट्रव्यापी लोकतांत्रिक आंदोलन एवं कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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