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पहाड़: धरती की ऊँची आत्मा

डॉ खुशबू शांतिलेख    लखनऊ उत्तर प्रदेश

पहाड़ सिर्फ पत्थर और मिट्टी का ढेर नहीं होते। ये धरती के फेफड़े, पानी की टंकी और मौसम के पहरेदार हैं। जब भी हम किसी पहाड़ को देखते हैं तो उसकी खामोशी में हजारों कहानियाँ छुपी होती हैं। भारत में हिमालय से लेकर अरावली तक, हर पर्वत का अपना इतिहास और महत्व है

पहाड़ बनने की सबसे बड़ी वजह प्लेट टेक्टोनिक्स है। करोड़ों साल पहले भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई। दोनों में से कोई भी नीचे नहीं गई और जमीन सिकुड़कर ऊपर उठ गई। ऐसे ही हिमालय बना। आज भी यह हर साल करीब 5 मिमी बढ़ रहा है, इसलिए यहाँ भूकंप आते रहते हैं। कुछ पहाड़ ज्वालामुखी से बनते हैं जैसे अंडमान का बैरन द्वीप। विंध्य और सतपुड़ा बहुत पुराने हैं। कटाव ने इन्हें छोटा कर दिया है।

 हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहते हैं। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु सब यहीं से निकलती हैं। देश की 45% आबादी का जीवन इन्हीं नदियों पर टिका है।  

हिमालय सर्दियों में साइबेरिया की बर्फीली हवा रोक देता है। पश्चिमी घाट अरब सागर से आने वाले मानसून को रोककर भारी बारिश कराते हैं। इसी वजह से केरल सबसे पहले भीगता है।  

: पहाड़ पर हर 1000 मीटर पर तापमान 6 डिग्री गिरता है। इसलिए तलहटी में साल के जंगल और 4000 मीटर पर घास के मैदान मिल जाते हैं। हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, मोनाल, पश्चिमी ट्रैगोपैन जैसे दुर्लभ जीव यहीं रहते हैं।  

*: दार्जिलिंग की चाय, हिमाचल का सेब, कश्मीर का केसर सब पहाड़ की देन है। उत्तराखंड और हिमाचल की 30% से ज्यादा आय पर्यटन से आती है। भारत की 40% पनबिजली पहाड़ी नदियों पर बनती है।  

बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ, वैष्णो देवी, हेमकुंड साहिब सब पहाड़ों में हैं। कैलाश मानसरोवर को दुनिया का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। 

ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय के ग्लेशियर 2100 तक एक तिहाई खत्म हो सकते हैं। इससे पहले बाढ़ और बाद में सूखा आएगा। 2023 में हिमाचल और उत्तराखंड में बादल फटने और भूस्खलन से सैकड़ों जानें गईं। चारधाम रोड और होटलों के लिए पहाड़ों को बेतरतीब काटा जा रहा है। जोशीमठ का धंसना चेतावनी है। प्लास्टिक और सीवेज ने भागीरथी तक को गंदा कर दिया है।

हमें इको टूरिज्म चुनना होगा। अपने कचरे को खुद वापस लाएँ। स्थानीय लोगों से सामान खरीदें ताकि पलायन रुके। सरकार को सड़क और बांध बनाते समय भूवैज्ञानिकों की सलाह माननी चाहिए। 11 दिसंबर को पर्वत दिवस मनाया जाता है, पर पहाड़ों को हर दिन बचाने की जरूरत है।  

पहाड़ हमें सिखाते हैं कि झुककर भी अडिग रहा जा सकता है। अगर ये रहेंगे तभी नदियाँ बहेंगी, हवा चलेगी और जीवन चलेगा। इन्हें बचाना खुद को बचाना है।



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